शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

करने के लिए कुछ न होना सबसे घातक है


निठल्लापन
समाज दो टुकड़ों में बंटा होता है, एक वह जिसे वक्त की कमी हर समय महसूस होती है उसके लिए चैबीस घंटे भी कम हैं। दिन रात काम में जुटे रहने पर भी कुछ न कुछ करने को बच ही जाता है। ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया का बोझ उसी पर हो और उसके काम न करने या ढिलाई बरतने पर समय का चक्र मानो थम ही जाएगा। हांलाकि अच्छी बात यह है कि ऐसे समाज की प्रगति की दर दिन दूनी रात चैगुनी होती है और यह भी कि अन्य लोगों के लिए प्रेरणा की मिसाल भी बनती है।

इसके विपरीत समाज का वह तबक़ा है जो खालीपन का शिकार है। करने को कोई काम नहीं और बस किसी तरह सुबह से शाम और फिर रात सो कर गुज़रने के बाद अगला दिन शुरू हो जाता है और इस तरह उम्र गुजरती रहती है।

इस समाज के दो वर्ग हैं। एक तो वह जो पढ़ा लिखा है और काम करना चाहता है और उसकी तलाश में रात दिन एक किए रहता है लेकिन उपयुक्त काम नहीं मिलता। इस अवस्था में जो मिल जाए वही सही की तर्ज़ पर जो काम मिला उसे अपना नसीब समझकर करने लगता है। होता यह है कि जो शिक्षा पाई वह ज्यादातर किताबी होने के कारण किसी काम न आई। कह सकते हैं कि सरकार और व्यवस्था ने जो पढ़ने को कहा उसमें बचपन और यौवन गुजार दिया और जब काम की तलाश में बाज़ार में निकले तो उस पढ़ाई का कोई मोल न मिला। अब या तो इंतज़ार में उम्र की सीढ़ियां चढ़ते रहिए कि कब कोई मोलभाव करने वाला मिलेगा और रोज़गार की तलाश खत्म होगी या फिर खाली रहकर निठल्लेपन की चादर ओढ़कर सोते रहिए।

इस समाज का दूसरा वर्ग उन लोगों का है जिनका मन ही नहीं करता कि कोई काम या रोज़गार किया जाए। अगर अपने चारों ओर नज़र दौड़ाई जाए, चाहे शहर हो या देहात ऐसे लोग काफी बड़ी संख्या में मिल जाएगें जो इधर उधर ताक झांक और मटरगश्ती करते हुए अपनी ऊर्जा नष्ट करते रहते हैं। इन्हें मौका मिलने की देर है और यह दादागिरी से लेकर नेतागिरी करने तक फौरन आगे आ जाएगें।
इनका सबसे प्रिय काम होता है कि किसी भी छोटी से छोटी बात को लोगों की भावनाओं से जोड़कर ऐसा माहौल तैयार कर देना कि समाज में बिखराव तक की नौबत आ सकती है। इसके उदाहरण जब तब हमारे सामने आते रहते हैं। हाल ही में एक फिल्म और उसके कलाकारों को लेकर देशभर में जो अफ़रा तफ़री तक के हालात पैदा हुए उसके पीछे इसी वर्ग की मानसिकता वाला समाज था जो बिना सोचे समझे इन लोगों की कुटिलता का शिकार हो गया।

शिक्षा की जिम्मेदारी
असल में समाज के इस अकर्मणय वर्ग के पनपने का सबसे बड़ा कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था है जो यह नहीं सिखाती या इस बात के लिए तैयार नहीं करती कि विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जीवनयापन के लिए ऐसा क्या काम या रोजगार अपनाए जिसमें उन्होंने जो शिक्षा प्राप्त की है इसका उपयोग हो सके। अधिकतर युवाओं को यही शिकायत होती है कि उनके पढ़ाई किसी काम नहीं आ रही और उन्हें अगर कोई नौकरी या व्यवसाय करना है तो सब कुछ नए सिरे से सीखना और पढ़ना होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि जीवन के पहले पंद्रह से बीस वर्ष तो व्यर्थ ही चले गए। ज़रा सोचिए इसमें कितने राष्ट्रीय संसाधनों का अपव्यय हुआ होगा।
आज जो शिक्षित बेरोजगारी की कतारें दिखाई देती हैं वह केवल इसलिए है कि एक बड़े वर्ग को वह पढ़ाया लिखाया ही नहीं गया जो उन्हें सार्थक जीवन के लिए तैयार कर सके।

आज जब हम इस वर्ग को कौशल विकास की टेªनिंग देते हैं तो उसके मन में यह आता है कि अब तक उसने जो शिक्षा पाई वो समय नष्ट करना था और अब जो टेªनिंग उसे मिल रही है वही उसके जीवन का आधार बनेगी।
यह युवा वर्ग इसी संशय में उलझा रहता है कि जब अब तक की शिक्षा उसे रोजगार देने  में असमर्थ थी तो स्किल डिवेलप्मेंट के नाम पर जो उसे सिखाया जा रहा है कहीं वह भी तो समय की बर्बादी नहीं। देश में कौशल विकास की योजनाएं पिछले दस पंद्रह वर्षों से चल रही हैं लेकिन उनके उम्मीद के मुताबिक परिणाम न निकलने से सफल नहीं कहा जा सकता प्रश्न उठता है कि क्यों नहीं बचपन से ही सामान्य भाषा ज्ञान के साथ उसे केवल वही विषय पढ़ाए जाएं और वही सिखाया जाए जो उसे जीवन के लिए तैयार कर सके। क्यों उसे ऐसे विषयों की शिक्षा दी जाती है जिनमें न तो उसकी रूचि होती है और न ही वे वास्तविक जीवन में उसके किसी काम आने वाले हैं।

बचपन की शिक्षा
गांव देहात में किसान की संतान को बचपन से ही किसानी के नए तरीके सिखाए जाए तो वह बड़ा होकर अच्छा किसान ही बनेगा। अभी तो यह है कि वह बड़ा होते ही शहर का रूख करने की सोचता है। परिणाम यह कि ग्रामीण क्षेत्र अपनी युवा शक्ति से वंचित तो होता ही है और शहर में भी वह युवा वर्ग कोई विशेष काबलियत न होने से बेरोजगारी ही बढ़ाता है।
शहरों में भी जो शिक्षा व्यवस्था है वह भी विद्यार्थियों को इस लायक नहीं बना रही कि वे सम्मानजनक नौकरी या व्यवसाय हासिल कर सकें। यहां भी अगर बचपन से ही बालक की प्रतिभा और रूचि का आंकलन कर उसे उसी के अनुरूप पढ़ाई कराई जाए और प्रशिक्षित किया जाए तो वह बड़ा होकर अपने आप अपनी नौकरी खोज लेगा या व्यवसाय कर लेगा।
जरा सोचिए इस तरह का समर्थ और ऊर्जावान युवा वर्ग स्वंय तैयार होगा तो सरकार की बेराजगारी दूर करने और नौकरियां पैदा करने की परेशानी कितनी कम हो जाएगी। युवाओं को सरकार पर निर्भर और समाज पर बोझ मत बनाइए। उसे बचपन से ही आत्मनिर्भर ठीक उसी प्रकार बनाइए जैसा कि उसे अपने सभी काम स्वंय करना बताया जाता है।

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

नौकरी नहीं- अपना रोजगार ही सर्वश्रेष्ठ है


चाय, पकौड़ा, भजिया, मसाले
कांग्रेस भी अजीब पार्टी है। उसके नेताओं के मुख से अक्सर ऐसी बातें निकल जाती हैं जो सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में हो जाती हैं। जरा सोचिए अगर मणिशंकर अय्यर ने 2014 के चुनाव से पहले नरेन्द्र मोदी को कांग्रेस अधिवेशन में चाय का स्टॉल देने की पेशकश नहीं की होती तो क्या कांग्रेस के प्रति मतदाताओं का इतना मोह भंग होता? अय्यर की कड़ी में ही अब चिदम्बरम आगे आ गए। उन्होंने मोदी और अमित शाह के पकौड़े प्रेम को भुनाते हुए कह दिया कि अगर पकौड़े बेचना रोजगार है तो भीख मांगना भी रोजगार होना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के पक्ष में फिर से उल्टी गंगा बहने लगी। देश भर से पकौड़े बेचने वालों के ही नहीं बल्कि इस तरह के अन्य काम धंधा करने वाले दुकानदार या व्यापारी इसे अपना अपमान समझकर प्रतिक्रिया देने लगे। अपनी तुलना एक भिखारी से करना किसे गवारा हो सकता था।

असल में हमारे देश में दो तरह के लोग बसते हैं। एक तो वो जो सोने-चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और दूसरे वो जो साधारण परिवार में जन्में हैं, जिन्हें गरीब कहा जाता है। अक्सर यही लोग अपनी मेहनत और दूरदृष्टि के बल पर पहली श्रेणी वालों से आगे निकलने में कामयाब हो जाते हैं। उदाहरण के लिए हल्दीराम ब्रांड के हल्दीराम एक बहुत ही साधारण परिवार में जन्मे थे। भुजिया बनाने का पुश्तैनी काम था जिसे पुड़िया में भरकर लोगों के घर तक पहुंचाते थे। परिवार के सभी सदस्य इसमें लगे थे। आज हजारों लोगों को इसमें रोजगार मिल रहा है। मसाला बेचने वाले एमडीएच के महाशय जी भी ब्रांड बन चुके हैं। अपने बाबा रामदेव को ही देख लाजिए। उनके पास ही कौन सी पैत्रिक धन-दौलत थी लेकिन आज पतंजलि ने दुनिया भर के नामीगिरामी ब्रांडो की नाक में दम कर रखा है।
हम यह बात भूल जाते हैं कि भारत में खेती बाड़ी को सबसे उत्तम कहा गया है। हम अपने आप को कृषि प्रधान देश भी मानते हैं। इसके बाद अपना व्यवसाय या रोजगार का महत्व है। नौकरी को अधम माना गया है और भीख मानना तो वर्जित ही है।

इतिहास क्या कहता है
तथ्य है कि अंग्रेजों को जब भारत के ज्यादातर लोग व्यवसाय करते दिखे और उन्हें अपनी सेवा या नौकरी करने के लिए लोग नहीं मिले तो लॉर्ड मैकाले ने ऐसी बदनाम शिक्षा चलाई कि लोग नौकरी को प्रमुखता देने लगे और वही काबलीयत का पैमाना बन गया। तब से आज तक नौकरी का ही बोलवाला है। नौकरी भी कौन सी, सरकारी। किसी सरकारी विभाग में चपरासी या क्लर्क की भी नौकरी परिवार की सुख समृद्धि से लेकर शादी विवाह तक में अपनी धाक जमा देती है। सरकारी नौकरी होने से विवाह प्रस्तावों की कोई कमी नहीं रहती। चाहे अपना कामधंधा करने वाला उससे कई गुना कमाता हो, शादी के बाजार में सरकारी नौकरी करने वालों को ही प्राथमिकता दी जाती है।
राहुल गांधी भी मोदीजी की आलोचना सिर्फ इसलिए करते हैं कि चुनाव के समय जो उन्होंने नौकरी देने का वादा किया था वह पूरा नहीं किया। जरा सोचिए, नौकरी करना क्या इतना जरुरी है कि चाय पकौड़ा बेचने वाला या ऐसा ही कोई काम करने वाला हमारे पूर्व वित्त मंत्री को भीख मांगना नजर आता है। अपना काम करने को न तो छोटा समझना चाहिए और न ही शर्म करनी चाहिए। सामन्ती मानसिकता, विलासिता का जीवन जीने वाले इसका महत्व क्या समझेंगे?

नौकरी का विकल्प
भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा हाथ उन लोगों का है जो गली, मुहल्ले, बाजार, हाट, फेरी लगाकर समान बेचने वाले हैं। साप्ताहिक बाजार या हाट किस दिन लगेगा इसका इंतजार सभी को रहता है क्योंकि वहां घरेलु उपयोग की चीजें बहुत सस्ते दाम पर मिल जाती हैं।
एक और हकीकत समझनी जरुरी है। जो दुकानदार होता है वो अपने यहां काम करने के लिए दो-चार सहायक भी रखता है। यह सहायक दुकानदारी के गुर सीखने के बाद कुछ समय में अपना काम करने के काबिल हो जाते हैं और वह सीधे अपनी दुकान या ठिया खोल लेते हैं। जरा गौर करिए, जिससे उसने दुकानदारी की कला सीखी वह इस बात का बुरा नहीं मानता कि उसके यहां काम करने वाला नौकर उसका प्रतिद्वन्दी बन गया है बल्कि जरुरत पड़ने पर व्यापार जमाने में उसकी मदद भी करता है। वह जानता है कि उसकी चलती दुकान में से तो कोई न कोई काम करने वाला या सीखने वाला मिल ही जाएगा। उसे गर्व होता है कि उससे यहां काम करने वाला भी एक कारोबारी बन चुका है।

अब इसकी तुलना उससे करिए जो दफ्तर में परमानेंट नौकरी करता है। उस व्यक्ति को हमेशा डर लगा रहता है कि  यदि उसकी नौकरी चली गई तो उसका और उसके परिवार का क्या होगा? असल में अंग्रेजों से लेकर हमारी सरकारों खासकर कांग्रेस सरकार ने नौकरी का लालच देकर हमारे युवाओं की सोच को ही कुंठित कर दिया है। वह यह सोचते रहते हैं कि नौकरी नहीं रही तो क्या होगा, जबकि दुकानदार कभी नहीं सोचता कि यदि उसका माल नहीं बिका तो क्या होगा ? वह उसे कम दाम में बेच कर अपनी दुकान में कोई अन्य चीज बेचने लगता है।
एक एतिहासिक तथ्य और भी है। जब देश का विभाजन हुआ तो जो लोग हमारे देश में आए और हमने जिन्हें शरणार्थी का नाम दिया, उन्होंने बहुत ही छोटे-छोटे काम कर के समाज में अपनी जगह बनाई। आज कारोबार के क्षेत्र में उनका सिक्का चलता है। किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया, नौकरी के लिए भीख नहीं मांगी और अपने परिवार का पेट एक भी दिन भूखे नहीं रहने दिया।

अब  जो यह नौकरी है, यहां डर ही लगा रहता है कि रिटायर हो गए तो आमदनी खत्म हो जाएगी और घर कैसे चलेगा। असल में नौकरी की कुछ ऐसी फितरत है कि वह अच्छे से अच्छे प्रतिभाशाली को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि वह नौकरी के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता। यही कारण है कि वह नौकरी में अपमान से लेकर भेदभाव तक सहता रहता है। ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं जिसमें नौकरी के दमघोटू वातावरण में जिन्दगी गुजारने के बजाए उसे लात मार कर खुद का कारोबार या व्यवसाय करने की हिम्मत जिन्होंने की,  उन्हें कामयाब होने से कोई नहीं रोक पाया।

हमारे पिछड़ने का कारण 
हमारे देश के साथ आजाद हुए या द्वितीय विश्य युद्ध में बर्बाद हुए देश आज हमसे इसलिए आगे हैं क्योंकि उन्होंने स्वरोजगार को महत्व दिया। चीन जापान को ले लीजिए। वहां के लोग नौकरी के लिए बाहर जाना तो दूर अपने ही देश में नौकरी करने को नहीं बल्कि छोटे-छोटे रोजगार खोलने को प्राथमिकता देते हैं। आज उनके उत्पाद पूरे विश्व में छाए हुए हैं और दुनियाभर में टेक्नोलॉजी से लेकर सभी चीजें मुहैया करा रहे हैं। मतलब यह है कि नौकरी इतनी जरुरी नहीं है कि उसपर इतना जोर दिया जाए बल्कि इस बात पर बल देना चाहिए कि लोगों को स्वरोजगार की आदत पड़े।

अब जरा ये देखिए कि जो लोग भारत से बाहर नौकरी करने के लिए जाते हैं वो इसलिए क्योंकि वहां अच्छी तनख्वाह मिलती है, सुख सुविधाएं ज्यादा होती हैं। हमारे देश के युवा वैज्ञानिक और प्रतिभाशाली लोग ज्यादा पैसों के लालच में अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में नौकरी करने चले जाते हैं। अब जरा उन्हें नौकरी देने वाले देशों के बारे में सोचिए। क्या उनके यहां नौकरी करने वाले लोग नहीं हैं? हकीकत यह है कि वहां के लोग नौकरी नहीं करना चाहते क्योंकि नौकरी से ज्यादा वह इस बात को समझते हैं कि अगर स्वरोजगार करेंगे तो ज्यादा फायदा होगा। नौकरी के लिए तो वह हमारे जैसे देशों से लोगों को उधार ले ही लेते हैं।

यदि भारत से पलायन करने वाले प्रतिभाशाली लोगों को रोकना है तो उन्हें रोजगार देना होगा और जो लोग पलायन कर चुके हैं उन्हें यदि वापस बुलाना है तो उनके लिए स्वरोजगार की व्यवस्था करनी होगी। हालांकि इसके लिए स्किल इंडिया या मेक इन इंडिया योजनाएं चलाई गई लेकिन इनका क्रियान्वयन इतना खराब रहा है कि लोगों का इनसे मोह भंग होने लगा है। सरकार की जितनी भी घोषणाएं हैं अमल करने का वक्त आते ही दम तोड़ देती हैं। हकीकत यह है कि आज भी बैंक में युवाओं को स्वरोजगार के लिए ऋण मिलना किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम नहीं है। बैंक कहता है कि सरकार तो योजनाएं बनाती ही रहती हैं, हम तो आपको ऋण तभी देंगे जब आप जमीन जायजाद, जमानत या कोई चीज गिरवी रखेगें।

अगर देश में स्वरोजगार को बढ़ावा देना है तो नियमों को बदलना ही होगा, जागरूकता फैलानी होगी और यह बताना होगा कि स्वरोजगार के लिए कौन से कदम उठाने जरूरी हैं, उसके लिए क्या क्या मशीनरी चाहिए और कितना धन चाहिए। इन संसांधनों को मुहैया कराना सरकार और बैंकों की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जबतक यह नहीं होगा सरकार ढपोरसंख की तरह अपनी तुनतुनी बजाती रहेगी, और देश में बेरोजगारी बढ़ती जाएगी। क्योंकि केवल नौकरी देकर इस समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता।

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

ऐसे भारत की कल्पना तो नहीं की थी


मेरा भारत
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और आजादी के दशक और उसके आसपास जन्मी पीढ़ी ने भारत की ऐसी कल्पना तो कतई नहीं की होगी जैसा कि देश की वर्तमान दशा और दिशा से प्रतीत होता है। एक खुशहाल, संपन्न और अनेक संप्रदाय, जाति, धर्म तथा विविधताओं के बीच सौहार्दपूर्ण देश की कल्पना अवश्य की थी।
आज स्थिति क्या है ? जहां एक ओर हम गर्व से झूम उठते हैं जब गणतंत्र दिवस पर अपनी सेना के पराक्रम और नवीनतम तकनीक से युक्त देश की प्रगति की झलक देखते हैं लेकिन तब ही शर्मसार भी हो जाते हैं जब इस राष्ट्रीय त्योहार पर सांप्रदायिक और धार्मिक हिंसा होते देखते हैं।
इसी तरह जब हम विदेशों में भारतीय साख का डंका बजते हुए देखते हैं तो वहीं देश में राम रहीम जैसे धर्म के नाम पर कुकर्म करने वाले बाबा को बचाने के लिए अपनी जान तक की बाजी लगाने को तत्पर हिसंक भीड़ के दृश्य विचलित कर देते हैं। इसी तरह एक साधारण फिल्म को लेकर कुछ लोग देश के सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करने की कोशिश में लगे सामने जाते हैं। 
आजादी के बाद तय हुआ था कि हर हाथ को रोजगार मिलेगा, कोई अनपढ़ नहीं रहेगा, सभी सेहत से मालामाल होंगे और भारत उन देशों की तरह विकसित देश कहलाएगा जो हमारे साथ या उसके आसपास ही आजाद हुए थे। सच्चाई यह है कि जो देश दूसरे विश्व युद्ध में पूरी तरह बर्बाद हो गये थे, जैसे कि जापान और जर्मनी, आज हम उनके सामने कहीं नहीं ठहराते। इसी कड़ी में यूरोप और एशिया के वे देश भी आते हैं जो आज हमसे बहुत आगे निकल चुके हैं, उनके यहां गरीबी और बेरोजगरी का पैमाना बदल चुका है। हम अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की गिनती ही करते रहते हंै। बेरोजगारी का आंकड़ा दिन प्रति दिन बढ़ रहा है और सकल घरेलू आय उन देशों के बराबर आने का नाम ही नहीं ले रही।

बेरोजगारी -एक कलंक
विश्व बैंक की माने तो विकासशील देश के प्रति व्यक्ति को सलाना 3 लाख से 7 लाख कमाना चाहिए तभी वह विकासशील की श्रेणी मे आएगा लेकिन हमारे देश का प्रति व्यक्ति 1 लाख भी सलाना नहीं कमाता तो हम तो इस श्रेणी से बाहर ही हैं।
देश ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जिनके पास रोजगार ही नहीं है। सरकारी नौकरी के एक पद के लिए लाखों-लाखों आवेदन भरे जाते हैं। वहीं सरकारी नौकरियों की चयन प्रक्रिया इतनी सुस्त है कि उस नौकरी को पाने में सालो साल लग जाते हैं तब तक या तो वह निराश हो चुका होता है या अपनी काबलियत से कम वेतन वाली नौकरी कर लेता है और इतना ही नहीं अगर उस नौकरी की आयु सीमा 25 वर्ष है तो वह उस नौकरी के योग्य भी नहीं रह जाता। सोचने वाली बात यह है कि अगर वह व्यक्ति उसी नौकरी के भरोसे है और अंत में उसे उससे भी हाथ धोना पड़ जाए तो वह क्या करे? स्वाभाविक है कि वह या तो आत्महत्या करेगा और अगर कहीं वह उग्र स्वभाव का हुआ तो अपराध का रास्ता अपना लेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि समाज और उसके नियम कानून कहीं कहीं अपराध को जन्म दे रहे हैं। जो देश के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है।
डेनमार्क का एक उदाहरण लीजिए। वह एक ऐसा देश है, जहां सबसे ज्यादा रोजगार है, जहां भ्रष्टाचार लगभग के बराबर है, नागरिको की आय में बहुत कम असमानता है। ऐसे ही एक देश है कनाडा जहां बेरोजगारी बहुत कम है। युद्ध में सबसे ज्यादा हताहत होने वाला जर्मनी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओ में से एक है क्योंकि वहां उद्यमिता को सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया गया। इतना ही नहीं यह दुनिया के सबसे ज्यादा शिक्षित देशो में भी शामिल है। न्यू-जीलैण्ड, जापान और चीन जैसे देश सबसे कम करप्शन वाले, आर्थिक रुप से मजबूत, और उच्च जीवन स्तर में आते हैं। वहां का एक अमीर इंसान अपनी कमाई उद्योग में, शिक्षा पर और लोगों की भलाई पर खर्च करता है। वहां टेक्स बचाने की नहीं जीवन स्तर सुधारने पर जोर दिया जाता है।
विदेशी बनाम भारतीय रईस
ऐसा नहीं है कि विकसित देशों में गरीबी और अमीर के बीच खाई हो लेकिन एक खास अन्तर है जिसकी वजह से वहां का अमीर यह कोशिश करता दिखाई देता है जिससे उनका गरीब तबका भी खुशहाल हो सके।
उदाहरण के लिए हमारे यहां अमीर लोग अपने रहने के लिए विलासितापूर्ण महल बनवाते हैं या फिर भव्य धार्मिक स्थल बनवाते हैं। यही बात सरकारी स्तर पर है। बेशकीमती जमीन राजनीतिज्ञों की मृत्यु के बाद उनकी स्मृति बनाए रखने के नाम पर हथिया ली जाती है।
विदेशी रईस अपना धन, विज्ञान और टेक्नालाजी अनुसंधान केन्द्र बनाने, शिक्षा संस्थानों की स्थापना करने और पिछड़े देशों में स्वास्थ्य तथा रोजगार के संसाधन जुटाने में खर्च करते हैं। भारतीय अमीर अपनी पीढ़ियों तक को आर्थिक सुरक्षा देेने का इंतजाम करता है, बच्चों की शादियों में करोड़ों रूपया खर्च करने में नहीं हिचकता और अपने वैभव का प्रदर्शन करने का एक भी अवसर नहीं छोड़ता। इसके विपरीत विकसित देशों के अमीर अपने परिवार के बजाए समाज के विकास में धन लगाने को प्राथमिकता देते हैं।
भारत एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता दोनों को कानूनी और सामाजिक मान्यता प्राप्त है। यहां शिक्षा पर नहीं धार्मिक और रीति रिवाजों के पाखंड़ो पर जोर दिया जाता है।
यूं तो भारत में 119 अरबपति है और इस लिहाज से भारत विश्व में तीसरा स्थान भी रखता है लेकिन गरीबी तो वहीं की वहीं बनी हुई है। लोग एक वक्त के खाने के लिए भी तरस रहे हैं और कुछ लोग लाखों का घोटाला कर के डकार भी नहीं मार रहे। लोगों की आय में इतना अन्तर है कि देश दो भागों में बंट गया है इंडिया यानि अमीर और भारत यानि गरीब।
यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम पर और कभी साम्प्रदायिक मुद्दों को लेकर घमासान बंद ही नहीं हो पा रहा है। लोग आज भी रुढ़िवादिता में ही फंसे हुए हैं।
जरूरी है कि जनमानस को अपनी सोच का दायरा बदलना होगा। इसमें सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उसे अपनी करनी से ऐसे उदाहरण पेश करने होगें जिनसे सामान्य नागरिक उसका अनुसरण करने को तत्पर हो।