शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

प्रदूषण पर प्रतिबंध सही या गलत जानिये

कानून की कवायद
परिवार हो या समाज समय के साथ उसकी अपनी परम्पराएँ बनती रहती है और समय समय पर उन में परिवर्तन भी होता रहता है। यह भी सत्य है कि यदि अगर वक्त की जरूरत और नजाकत को नजरंदाज कर दसियों या सैंकड़ों वर्ष पहले बना कोई रीति रिवाज जिसका अब कोई अर्थ या ओचित्य न रहा हो और उसे न बदलते हुए हम उस से चिपके रहें तो या तो वर्तमान पीढ़ी उस पर चलने से इंकार कर देती है या फिर सरकार उसे बदलने की कोशिश करती है और अगर इस से भी कुछ ना हो तो कानून के जरिए उसे बदलने का काम किया जाता है।
पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने दीवाली पर पटाखे चलाने पर रोक लगा दी क्योंकि उससे प्रदूषण बढ़ने की आशंका थी जो पहले ही खतरनाक स्तर पर जा पहुँचा है और नागरिकों की सेहत खराब करने में कसर नहीं छोड़ रहा। हालाँकि कहा जा सकता है कि पटाखों से उतना नुकसान नहीं होता जितना ट्रक और बस से लगातार उगलने वाले धुएँ से होता है या फिर बिल्डिंग बनाते समय नियमों का पालन न करते हुए धूल मिट्टी से होता है या कल कारखानों में नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए सबसे ज्यादा वायु से लेकर जल तक में प्रदूषण का जहर घुलता है। फसल काटने के बाद खेतों में बचा कचरा जलाने से हवा में जो प्राण घातक विष मिल जाता है उस पर काबू करने में न तो सरकार न ही न्याय व्यवस्था सफल हो पाई है।
हैरान करने वाली बात है कि दीवाली पर एक दिन पटाखे चलाने से होने वाले प्रदूषण का बहाना बनाकर उन हजारों छोटे दुकानदारों की रोजी पर लात लगने का ध्यान नहीं आया जिन्होंने पटाखों का लाइसेंस लेकर अपनी जमा पूँजी लगा दी ताकि त्योहार पर उनकी कुछ आमदनी हो जाए। जिन तथाकथित एक्टिविस्टों ने दुधमुँहे बच्चों की आड़ लेकर यह फैसला कराने में कामयाबी पा ली अगर इसकी बजाय वे अपनी ऊर्जा बड़े पैमाने पर प्रदूषण के जिम्मेदार लोगों की नकेल कसे में जाने में करते तो समाज का कहीं अधिक भला होता।
इसी तरह खेती के लिए जंगल जलाने की परम्परा समाप्त करने की कवायद की जाती तो अधिक बेहतर होता। नदियों को गंदा करने की धार्मिक आधार पर की जाने वाली परम्पराओं पर रोक लगाने की बात होती तो कुछ समझ में आता कि सही जगह पर निशाना लगा है।
ऐसा नहीं है हमारे पूर्वजों को पर्यावरण की चिंता नहीं थी। मिसाल के तौर पर जहाँ खेती की जमीन तैयार करने के लिए जंगल जलाने की परम्परा बनी तो वहाँ पवित्र गुफा भी बनती थी जिसके अंतर्गत एक विशाल भू भाग में न कोई पेड़ काट सकता था न वहाँ से एक पत्ता तक ले जा सकता था। जंगल अपने मूल रूप में सुरक्षित रहता था और खेती के लिए काटे जाने वाले जंगल की भरपाई होने का प्रबंध हो जाता था।
इसी तरह जहाँ कुछ पेड़ों को जरूरत पड़ने पर काटने पर कोई रोक नहीं थी तो यह भी परम्परा रही है कि पीपल और बरगद तथा बहुत से लाभकारी वृक्षों को किसी भी कीमत पर न काटा जाय। अब जब बिना सोचे समझे वनों का सफाया शहर बसाने के लिए होता है तो यह अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा ही तो है।
इसी तरह जहाँ नदियों के जल में पूजा सामग्री या मूर्ति विसर्जन करने की परम्परा थी तो वहाँ हरेक बस्ती में तालाब बनाने की भी थी जिसमें जरा सी भी गंदगी डालने वाला पाप का भागी और दंड का पात्र होता था। ये तालाब कहाँ खो गए सब जानते हैं।
हम अक्सर धर्म के नाम पर चलाई गयी परम्पराओं का विरोध केवल इसलिए करते हैं क्योंकि सभी धर्मों की अपनी मान्यताएँ हैं और कुछ तो कट्टरता की इस हद तक है कि उनके लिए खून खराबे की नौबत आ जाती है। समाज विरोधी तत्व इस हद तक हवा देते हैं धर्म रक्षा के नाम पर दंगे फसाद हो जाते हैं और जानमाल के नुकसान का जो तांडव होता है वह कभी न मिटने वाली खाई पैदा कर देता है।
अभी हाल ही में एक और फैसला आया है जो शादी के बाद पत्नी के साथ सहवास करने की उम्र तय करता है। इसमें अगर पत्नी अठारह वर्ष की नहीं है तो उससे सहवास को बलात्कार माना जाएगा और कानून के मुताबिक सजा मिलेगी।
यह फैसला करने की नौबत इसलिए आई क्योंकि हमारे देश में बाल विवाह की परम्परा थी और वयस्क होने से पहले ही गर्भवती हो जाने से बालिका वधू का जीवन संकट में पड़ जाता था।
इस फैसले से बाल विवाह की शिकार मासूम कन्या को कोई राहत मिलेगी इसमें संदेह है क्योंकि शादी हो जाने पर यदि उसके साथ सहवास किया जाता है जो कि होगा ही तो क्या वह इतनी हिम्मत कर पाएगी कि अपने पति की शिकायत अदालत में करने जा सके। अगर उसमें हिम्मत ही होती तो वह अपना बाल विवाह क्यों होने देती इस बात पर ध्यान दिए बिना यह फैसला हो गया जिस पर अमल हो पाना उतना ही मुश्किल है जितना पर्यावरण को लेकर हुए फैसलों पर अमल करवा पाना सिद्ध होता रहा है।
एक बात और हमारे यहाँ बाल विवाह के साथ यह भी परम्परा थी कि लड़की की विदाई की रस्म जो गौना कराना थी तब ही होती थी जब लड़की सहवास करने और गर्भ धारण कर सकने की उम्र की हो जाती थी चाहे शादी के बाद यह पाँच दस साल बाद ही क्यों न हो।
वास्तविकता समझना जरूरी
धर्म और संस्कृति का हवाला देकर या उसकी रक्षा के नाम पर होने वाले मतभेद से लेकर लड़ाई तक हो जाने से बचा जा सकता है बशर्ते कि हम यह स्वीकार कर  लें कि केवल आँख मूँदकर या भेड़चाल पर चलते हुए परिवर्तन का कोई मतलब नहीं होता।
वास्तविकता को नजरंदाज करने का ही परिणाम है कि आज ढेरों कानून होने के बावजूद समाज में अराजकता है आपाधापी है और एक दूसरे के प्रति नफरत का विस्तार हो रहा है।
वर्तमान संदर्भ में अन्तर्राष्ट्रीय कवि पाब्लो नेरूदा की यह कविता सार्थक है जिस पर उन्हें नोबेल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है।
नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता ष्ल्वन ैजंतज क्लपदह ैसवूसलष् का हिन्दी अनुवाद...
1)  आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- करते नहीं कोई यात्रा,
- पढ़ते नहीं कोई किताब,
- सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
- करते नहीं किसी की तारीफ।
2)  आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप :
- मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
- नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।
3)  आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
- चलते हैं रोज उन्हीं रोज वाले रास्तों पे,
- नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
- नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
- आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
4)  आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज आपकी धड़कनों को।
5)  आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- नहीं बदल सकते हों अपनी जिन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
- अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
- अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
- अगर आप नहीं देते हों इजाजत खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं..!!
 (भारत)


शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

समाज में केवल युवा नहीं, बुजुर्ग भी जरूरी हैं

सम्मान और अपमान
अक्तूबर का महीना वैसे तो त्यौहारों, बदलते मौसम और सालाना साफ सफाई करने के लिए जाना जाता हे लेकिन पहली अक्तूबर को यह अन्तर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाए जाने से भी शुरू होता है।
बढ़ती उम्र से यह मानना कि अब कुछ करने की क्षमता नहीं रही, यह बात इस वर्ष भौतिकी में नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों ने झुठला दी क्योंकि उनमें से एक 80 वर्ष से कुछ कम और दो 80 के दशक का मध्य भी पार कर चुके हैं।
इसी के साथ हमारे देश के एक पूर्व वित मंत्री और कर्मठ और सक्रिय नेता ने जब अपनी ही पार्टी की नीतियों की आलोचना की तो वर्तमान तथाकथित युवा मंत्री की टिप्पणी थी, ‘यह 80 की उम्र में नौकरी के लिए आवेदन करना है।‘  इस पर पूर्व मंत्री का पलटवार था कि अगर हम न होते तो जहां आप अभी हैं, वहां न होते। क्या यह युवाओं के अहंकार और बड़ी उम्र वालों के दम्भ का प्रतीक नहीं है? किसी टिप्पणी से सहमत या असहमत होना अलग बात है लेकिन उम्र को लेकर अभ्रदता की सीमा पार कर देना कतई उचित नहीं कहा जा सकता।
आज विश्व भर में विशेषकर उम्रदराज लोगों में स्वस्थ रहने की एक होड़ सी लगी है और व्यक्ति अन्तिम यात्रा तक शारीरिक और मानसिक रूप से चलते फिरते रहने तथा बुद्धि का अधिक से अधिक उपयोग करते रहना चाहता है। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि अब उम्र केवल मात्र एक संख्या से अधिक नहीं और उसका व्यक्ति की क्षमता से कोई लेना देना नहीं है।

इस अनुमान पर गौर कीजिए! सन् 2030 तक 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्ति तब 15 से 24 वर्ष के युवाओं की आबादी से अधिक हो जाएगें।ं क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि सरकार नीतियों को इस दूरगामी सोच के साथ बनाए कि जिसे हम बुढ़ापा कहते हैं, और हमारे शास्त्रां में वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में प्रवेश की आयु कहा गया है, उसका देश और समाज के हित में सदुपयोग किस प्रकार किया जाए?
वर्तमान प्रधानमंत्री की यह सोच कि 75 वर्ष से अधिक का कोई व्यक्ति उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के उपयुक्त नहीं है, वरीयता, अनुभव और उन व्यक्तियों के सम्मान पर चोट ही तो है जो जीवनभर कर्मठ बनकर कुछ न कुछ देश और समाज को देते ही रहे और अब भी किसी से कम नहीं, बशर्ते उनकी प्राकृतिक रूप से शारीरिक क्षमता के घटते जाने पर ध्यान न देकर उनके ज्ञान का लाभ उठाते हुए न केवल उनका सम्मान किया जाए बल्कि उनकी अन्य विविध क्षमताओं का पूरा लाभ लिया जाए।
वृद्धावस्था अभिशाप नहीं
जब भी इन दिनों मुझसे मेरी उम्र पूछी जाती है और मैं 75 पार करने की बात बताता हूं तो पूछने वाला आश्चर्य मिश्रित नजरों से देखते हुए सराहना या उपेक्षा करने के अन्दाज में कहता है कि आप इतनी आयु के लगतेनहीं या अब तो आप काम करना छोड़कर आराम किया कीजिए! मैं केवल उनकी ओर विस्मय से मुस्कुराता हूं और केवल इतना कहता हूं कि मेरे लिखने पढ़ने और फिल्में बनाने के व्यवसाय में घूमना फिरना, लोगों से मिलना जुलना और भागदौड़ करना जरूरी है और मुझे इसमें मज़ा भी आता है। अभी भी मैं भारत चीन सीमा पर चुशूल की चोटी पर चढ़ जाता हूं, वनों में चला जाता हूं, स्वंय गाड़ी चलाता हूं और 10-12 घंटे तो काम करता ही हूं। हां इसी के साथ सोने जागने तथा खानपान के वक्त का ध्यान रखते हुए सांयकाल एक या दो पेग सुरापान भी करता हूं मतलब यह कि जिस तरह अब तक जीवन की धारा बहती रही उसे उसी तरह बहने देता हूं।
इसे भारतीय समाज की विडम्बना नही ंतो और क्या कहेंगे कि हमारे देश में 65 प्रतिशत व्यक्तियों के पास वृद्धावस्था का आनन्द उठाने या कम से कम ठीकठाक उम्र गजारने का कोई साधन ही नहीं बचता। वे जीवन भर संघर्ष, जद्दोजहद, परिवार के पालन, बच्चों के कैरियर से लेकर घर बनाने तक में ही लगे रहे और उस मोड़ पर पहुंच गये जब उनके लिए अपने स्वास्थ्य की देखभाल और दो वक्त के भोजन के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं बचे।
केवल शेष 35 प्रतिशत ही ऐसे हैं जिनके पास इस उम्र में भी आमदनी के समुचित साधन हैं। वे अपने शौक पूरे कर सकते हैं, जिनके बारे में सोचने का मौका उन्हें जीवन की आपाधापी में मिला ही नहीं और जिनके पास अपना घर, पूंजी, बचत के साथ साथ ऐसा परिवार भी है जिसमें वे बच्चों के कन्धे पर हाथ रखकर आत्मीयता का अनुभव कर सकते हैं।
जब कोई ऐसा दृश्य सामने आता है जिसमें गली मौहल्ले, सड़क, चौराहे धार्मिक स्थलों या किसी सार्वजनिक या पारिवारिक समारोह के बाहर खड़ा कोई बुजुर्ग भीख मांगता या मजदूरी की आस में हमारी ओर बढ़ता है तो उसे प्रताड़ित करने, बुरा भला कहने या झुझंलाते हुए कुछे सिक्के उसकी ओर उछाल देने को ही अपना पौरूष मान लिया जाता है। कतई यह ध्यान नहीं आता कि उनकी इस अवस्था के लिए समाज और सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार है जितने कि उनके परिवार।
बुजुर्गों के साथ पारिवारिक और सामाजिक दुर्व्यवहार का सबसे अधिक शिकार वे महिलाएं होती हैं जो विधवापन के साथ दसियों बरस तक जीवित रहती हैं। दो तिहाई उम्रदराज लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उनके भी कोई अधिकार हैं, वे भी पारिवारिक और सामाजिक प्रताड़ना से बचने के लिए कानून का सहारा ले सकते हैं, अपनी देखभाल के लिए बच्चों द्वारा उचित व्यवहार न करने पर उन्हें दण्ड दिला सकते हैं।, अपनी जमीन जायदाद और बचत से उन्हें बेदखल कर सकते हैं, अपनी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने से लेकर अपमानित किये जाने तक का प्रतिकार कर सकते हैं।
भविष्य की ओर कदम
2017 के बुजुर्ग दिवस का थीम भविष्य की ओर कदम बढा़ना है। यह तब ही संभव है जब बढ़ती उम्र को थोड़ा सा नजरन्दाज करना सीख लिया जाए। अपने मन से कल क्या होगाका फालतू डर निकाल कर फेंक दिया जाए और यह फार्मूला अपनाया जाए कि डर के आगे ही जीत है। इसके लिए नियमों के रूप में प्रचलित सामाजिक और पारिवारिक बंधनों को तोड़ना भी पड़े तब भी संकोच न करते हुए बस उनकी अवहेलना करना ही सीख लिया जाए तो काफी होगा। समझ लीजिए कि सोच कभी भी आ सकती हैऔर अगर कुछ कर के दिखाना है और नाम करना है तो रिस्क उठाना ही पड़ेगा।
ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं जिनमें 70 से 100 या उससे भी अधिक उम्र के पुरूष ही नहीं महिलाओं ने भी अनेक कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इनमें पढ़ाई की डिग्रियां लेने, विश्व भ्रमण करने और अपने अजीबोगरीब शौक पूरे करने की एक लम्बी फेहरिस्त है।
यही नहीं, जो मार्केट्रिग व्यवसाय के महारथी हैं उन्होंने बुजुर्गो को अपने उत्पादनों की बिक्री का जरिया भी बना लिया है। आज विज्ञापनों में बड़ी उम्र के व्यक्तियों से माडलिंग कराने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। जब व्यापारी बुर्जुगियत से मालामाल होने की योजना बना सकता है तो बुजुर्ग स्वंय अपनी प्रतिभा पहचान कर अपनी और देश की तरक्की में युवाओ के साथ बराबरी की भागीदारी क्यों नहीं कर सकते?
उम्र बढ़ने पर अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक व्याधियों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसमें गठिया, मोटापा, कमजोर हड्डियां, शिथिल मांसपेशियां, कम सुनाई या दिखाई देना, याददाश्त कम हो जाना, किसी बात को समझने में वक्त लगना, जल्दी खीज जाना या अपने मन का न होने या उपेक्षित किये जाने पर क्रोधित हो जाना, यह सब तब कोई ज्यादा मायने नहीं रखता जब बुजुर्ग पीढ़ी इन्हें जीवन की सामान्य प्रक्रिया या परिवर्तन की कड़़ी समझने में सफल हो जाती है।
युवा पीढ़ी के लिए इतना ही मान लेना काफी है कि जब उसके अधिकारों की बात हो तो यह ध्यान रखें कि उसका अस्तिव बुजुर्ग पीढ़ी की बदौलत ही है। यह नौजवानों का ही दायित्व है कि वे अपने परिवार और समाज में अपने बुजुर्गां की शारीरिक और मानसिक क्रियाओं को गतिशील रखने के लिए उचित प्रबंध करें क्योंकि इस उम्र में उपेक्षा का भाव आत्महत्या से लेकर हिंसात्मक व्यवहार तक की ओर ले जा सकता है।
 (भारत)


मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

स्वच्छता की कहानी- बापू से मोदी तक की जुबानी


सफाई के पैरोकार गांधी
सन् 2014 में महात्मा गांधी के जन्मदिन पर उनके ही एक हथिहार को ढाल बनाकर जश्न
के माहौल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषणा की गयी थी कि सन् 2019 में बापू की
150वीं जयन्ती पर देश को संपूर्ण स्वच्छता का उपहार दिया जाएगा।
बापू के इस हथियार को समझने से पहले यह जान लेना होगा कि मोहन दास कर्मचन्द
गांधी महात्मा, बापू और राष्ट्रपिता कैसे बने? उल्लेखनीय है कि प्रत्येक दल विशेषकर
कांग्रेस और अब भाजपा उन्हें भुनाने का कोई मौका नहीं छोडते़। बापू कोई अवतार,
भगवान या विश्व का संचालन करने वाली अदृश्य शक्ति नहीं थे, बल्कि हमारे जैसे ही
जीते जागते इंसान थे। उनमें भी वे सभी गुण, अवगुण थे जो किसी भी हाड़ मांस के प्राणी
में हो सकते हैं। वे उसी प्रकार सोचते और करते थे जैसे कोई भी व्यक्ति अपने जीवन
काल में करता है।
आजादी के आसपास जन्मी पीढ़ी और पिछले दो तीन दशक की युवा पीढ़ी की सोच में
अन्तर हो सकता है लेकिन लगभग सौ साल पहले महात्मा गांधी ने स्वच्छता को लेकर जो
अपने ही किस्म के आन्दोलन का सूत्रपात किया था वह आज भी हमारा मार्गदर्शक है।
गांधी जी ने स्वच्छता की महिमा को दक्षिण अफ्रीका में ही समझ लिया था और इसे लेकर
गोरे और काले लोगों के बीच होने वाले भेदभाव को मिटाने की शुरूआत भी कर दी थी।
डर्बन में प्लेग की महामारी, जोहन्सबर्ग में बीमारी के मूल कारण गन्दगी को समझकर
उन्होंने इसके हल निकालने शुरू कर दिये थे।


गांधी और भारत
इतना समझ लेने के बाद यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाएि कि जब वे भारत
आए और कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे तो बिना किसी के बताए या निर्देश दिये
एक ऐसा काम स्वंय करने के लिए आग े आ गय े जिसे नीचा समझा जाने के कारण न ता े
कोई कर रहा था और न ही प्रबन्धकों ने उचित व्यवस्था की थी।
उन्होने देखा कि समारोह स्थल पर जहां पंडाल जगमगा रहा था वहीं पास में धूल, मिट्टी,
गन्दगी बुदबुदा रही थी जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं था। गांधी जी ने अपने आप
सफाई करनी शुरू कर दी, संडास की सफाई सुनिश्चित की, मैला तक स्वंय ढोने में शर्म
महसूस नहीं की और वह सब काम किये जो कि पढ़े लिखे हों या अनपढ़ आज भी करने
से कतराते हैं।
इसके बाद भारत को आजादी दिलाने के स ंकल्प के तहत जहां भी जाते, स्वच्छता, सर्फाइ
और गन्दगी उन्मूलन को रेखांकित करते रहते। यह उन्होंने ही कहा था कि ‘स्वच्छता
राजनीतिक स्वतत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है।‘ काशी विश्वनाथ मंदिर की गन्दगी को
देखकर ही कहा था, ‘क्या यह महान मंदिर हमारे चरित्र र्का आइ ना नहीं है।‘ उनका
मानना था क मां अपने बच्चे की गन्दगी को साफ करने के लिए भगवान का दर्जा पा
लती है तो जो सर्फाइ कार्य   े ं लग े है ं और जिन्हें हम अछूत कहते आए हैं, हमारी गन्दगी
साफ करते हैं तो क्योंकर उन्हें भगवान का दर्जा नहीं दिया जा सकता?
यह एक कडुवा सच है कि सफाईकर्मी आज भी हमारे लिए अस्पृश्य हैं। क्या यह उदाहरण
कम है कि पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने सफाई कर्मियों द्वारा छोटी झाडू से सफाई
करने पर उन्हें केवल लम्बे डण्डे वाली झाडू मुहैया करवाकर अपने कर्तव्य की इति श्री कर
ली। विडम्बना देखिए कि सन् 2014 में झाडू से ही स्वच्छता अभियान की शुरूआत की
गयी। क्या यह सरकारों का निकम्मापन समझने के लिए काफी नहीं है कि पिछले 60-70
वर्ष में सफाई के नाम पर अरबों रूपया डकारने के बावजूद आज भी हमारे नेता सफाई के
मूल रूप को समझने में भी नाकाम सिद्ध हो रहे हैं।
गांधी ने कहा था
गांधी जी ने सौ साल पहले ही गन्दगी उन्मूलन की रूपरेखा तैयार कर दी थी। उनका
लेखन और कार्यशैली इस बात की गवाही देने के लिए काफी है कि उन्होंने ही हमें तमीज
सिखाई थी कि सालिड वेस्ट को कैसे खाद मे ं बदला जा सकता है। शौचालय बनने तक
उन्होंने ही यह आदत अपनाने को कहा था कि खुल में शौच करने पर गन्दगी को मिट्टी
और राख से ढंक दो और उन्होंने ही यह कहा था कि शौच के बाद हाथों को मिट्टी, राख
या साबुन से धोने के बाद ही कुछ करना है। उन्होंने ही वे तरीके सुझाए थे जिनसे मानव
मलमूत्र का सुरक्षित निपटान किया जा सकता है। ग्रामीण स्वच्छता, सफाई से रहने के
लिए जरूरी कामों को दैनिक दिनचर्या में शामिल करना, वेस्ट मैनेजमेंट, व्यक्तिगत, घरेलू
और सामाजिक स्तर पर साफ सफाई की विधियो ं का पालन करना बताया था। उन्होंने ही
स्वच्छता को अस्पृश्यता उन्मूलन से जोड़ा था और सफाई कर्मियों को समाज में उनका
सही स्थान दिलाने की वकालत की थी।
क्या यह समझना इतना मुशकिल है कि अगर आजादी के बाद से ही हमने स्वच्छता
अभियान के प्रति सकारात्मक रूख अपना लिया होता तो आज फिल्मी सितारों के जरिए
वही बातें बार बार हमारे कानों में नहीं पड़तीं।
हमारी सरकारी व्यवस्था, नागरिक प्रशासन और उससे निकली हमारी सोच ने सफाई को
इतना गैर ज़रूरी समझा है कि बापू के बाकी गीतों को तो हम गुनगुनाते हैं लेनिक उनकी
यह कविता भूल से भी याद नहीं करते; ‘मैंने अंग्रेजों को बाहर फेंका था, तुम कूड़ा तो फेंक
कर दिखलाओं। हमने स्वतंत्र भारत दिया था, तुम स्वच्छ भारत तो दे जाओ।‘
शौक नहीं मजबूरी है
हमारे नेताओं और प्रशासकों की समझ में इतनी सी बात नहीं आती कि गांव देहात में यदि
कोई खुले में शौच जाता है तो वह यह उसके लिए खुशी की बात नहीं है बल्कि उसकी
मजबूरी है क्योंकि आसपास शौचालय नहीं है, अगर जैसे तैसे बना भी दिये तो वेस्ट
डिस्पोजल का इंतजाम नहीं है। गांव कस्बे या शहरों की झुग्गी झोपड़ियों में आज भी
नालियां गन्दगी उजागर करती है। निकम्मेपन की हद तो देखिए कि मेनहोल की सफाई
के लिए जिन्दा आदमी को मौत के कुएं में धकेल दिया जाता है, कूडे के पहाड़ मुहं चिढ़ाते
रहते हैं, इन मुद्दों पर न कोई सरकार गिरती है, न किसी अफसर पर गाज गिरती है
और न ही भविष्य मे इनसे निपटने के लिए कोई कारगर योजना बनती है। पेशाबघर न
होने से खुले में मूत्र विसर्जन करना पड़ता है। महिलाओं और बीमार व्यक्ति का परेशान
होना तय है।
केवल इतना कर दो
वर्तमान सरकार से यही अनुरोध है कि बेशक गांधी जयन्ती पर स्वच्छता अभियान की
शुरूआत मत करो, परन्तु देश के स्वच्छता का आवरण तो प्रदान कर दो। आधुनिक
टेक्नालाजी उस तक पहुंचाने का इंतजाम कर दो। सफाई के लिए झाडू की बजाए सफाई
मशीन सफाई कर्मियों को दे दो।
अगर केन्द्र और राज्यों की सरकारें तथा स्थानीय प्रशासन केवल चार स्थानों में साफ
सफाई की व्यवस्था कर दे ंतो आधी लड़ाई पर विजय पा सकते हैं।
ये स्थान हैं 1) रेलवे स्टेशन 2)अस्पताल 3) धार्मिक स्थल और 4) बूचड़खाने।
इस गांधी जयन्ती पर जो जश्न होने वाला है और गांधी जी की 150 वीं जयन्ती पर देश
को पूर्ण स्वच्छता का उपहार दिये जाने की बात दोहराई जाने वाली है, उसमें प्रधानमन्त्री
श्री मोदी जी केवल यह घोषणा कर दीजिए कि ये जो चार स्थान बताए गए हैं, वहां
स्वच्छता के सभी पैमानों पर खरा उतरने की पक्की व्यवस्था 2019 तक कर दी जाएगी।
हमारे यहां जितने भी राजनीतिक दल है वे सभी वोटों की खेती को ध्यान में रखकर ही
अपनी नीतियां बनाते हैं, केवल इतना कर दें कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को किसी भी स्तर
का चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट नहीं देंगे जिसके चुनावक्षेत्र में एक भी घर में
स्वच्छ शौचालय नही है। बाजारों में पर्याप्त सार्वजनिक शौचालयों की व्यवस्था होना उनकी
योग्यता का पैमाना हो।
उनके क्षेत्र में स्थित स्कूलों में लड़के लड़कियों के लिए अलग टाॅयलेट का इंतजाम
करवाना उनकी उपलब्धि मानी जाए और अगर कहीं किसी प्रत्याशी ने अपने क्षेत्र में वेस्ट
डिस्पोजल और वेस्ट मैनेजमेंट के लिए टेक्नालाॅजी आधारित प्लाण्ट लगा दिया हो तो उस े
टिकट देने में प्राथमिकता मिले।
सरकारें और राजनीतिक दल बस इतना कर लें, बाकी तो सामान्य नागरिक अपने आप
संभाल ही लेंगें।

रविवार, 17 सितंबर 2017

कूड़े के ढेर में छिपा है सोना चांदी

कुदरत का करिश्मा
यह शाश्वत सत्य है, चाहे मीठा समझें या कडुवा, कि संसार में जितने भी जीव है, उन्हें जो कुछ प्रकृति से मिलता है, वह उन्हें लौटाना ही होता है। लौटाते वक्त उस वस्तु का स्वरूप  इस गीत के बोल, ‘हर पल बदल रही है रूप जिन्दगीके अनुरूप बदल सकता है।
इसे हम कुदरत द्वारा की जाने वाली रिसाईक्लिंग भी कह सकते हैं।  यह चक्र प्रति क्षण चलता रहता है, कभी रूकता नहीं। हम अपनी अज्ञानता या अहंकार के वशीभूत होकर इस सच्चाई से मुंह फेर सकते हैं लेकिन उससे बचकर निकल जाना असंभव है। एक कहावत है कि जब बाल कटवाने गये व्यक्ति ने नाई से पूछा कि बाल कितने‘, तो उसका जवाब था, ‘जितने आपके आगे गिरेंगे,‘ कहने का मतलब यह कि जैसी करनी वैसी भरनी के सिद्धांत पर चलते हुए अगर हम आज बबूल का पौधा लगाएगें तो उसमें आम लगने की उम्मीद करना कैसे संभव है।
अभी हाल ही में राजधानी दिल्ली के एक इलाके में कूड़े के ढेर की वजह से जो हादसा हुआ और जिसमें अनेक लोग मारे गये, आसपास रहने वालों की जिन्दगी नरक के समान हो गयी। यही नहीं, वहां से निकलने वाली दूषित हवा में सांस लेने से दूर दूर तक सांस की बीमारियां, अस्थमा, त्वचा रोग के चपेट में लोग आ रहे हैं। कुछ साल बाद यह महामारी का रूप भी हो सकता है।
यह सब इसलिए हो रहा है और आगे भी होने जा रहा है क्योंकि समाज से लेकर सरकार तक ने वहां क्षमता से अधिक कूड़े का जमाव होने दिया और उसके ट्रीटमंेट का कोई इंतजाम नहीं किया। यदि इसके विपरीत कूडे़ कचरे के ढेर से लाखों लोगों को गैस की सप्लाई का इंतजाम हो जाता, कूड़े से बिजली बनाए जाने के संयंत्र लगा दिये जाते और हजारों घरों को रौशन किया जाता, कूड़े से बेशकीमती जैविक खाद का उत्पादन कर हजारों किसानों की खेतीबाड़ी को आसान बना दी जाती जिससे उनकी उपज बढ़ती, तो कुछ बात होती, लेकिन उस कूड़े को अपने निकम्मेपन और अदूरदर्शी नीतियों के कारण हमने भयानक हादसों का जनक बना दिया।
इस तरह के कूड़े के ढेर दिल्ली में ही नहीं देश के लगभग सभी बड़े शहरों में हैं जिन्हें हम लैण्डफिल साईट कहते हैं। इन जगहों पर पूरे देश का कूड़ा जमा हो जाता है। अब जिन राज्यों ने बुद्धिमानी से काम लिया तो उन्होंने इसे उर्जा स्त्रोत तथा आमदनी का जरिया बना लिया और जिन्होंने पहले दर्जे की मूर्खता दिखाई, उन सरकारों ने अपने नागरिकों की जिन्दगी को नरक बना दिया और उन्हें बीमारी, गंदगी का तोहफा दिया।
जी हां, हम बात कर रहे हैं वेस्ट मैनेजेमेंट की कि किस तरह से घरों, दुकानों और उद्योगों से निकले कचरे को सुरक्षित और असरदार तरीके से आमदनी का साधन बनाया जा सकता है। अर्थव्यवस्था को मजबूत कर अर्थ शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार कम खर्चे में बेहतरीन साधन मुहैया कराए जा सकते हैं। बस बात इतनी सी है जिसे समझने में दसियों वर्ष बिता दिये और एक के बाद एक हादसे होने दिये। परिणामस्वरूप नागरिकों का जीवन कठिनाईयों से घिरता रहता है और एक दिन चक्का जाम जैसी स्थिति सामने आ खड़ी होती है।
घर से शुरूआत
जहां तक वेस्ट मैनेजमेंट की बात है, इसकी शुरूआत प्रत्येक नागरिक अपने घर से ही कर सकता है, केवल इतना ध्यान रखें कि घर के बाद समाज, उसके बाद, शहर, फिर राज्य और उसके बाद देश की जिम्मेदारी बनती है। मतलब यह  कि पहले अपना घर संभालो।
घर से ही वेस्ट मैनेजमेंट की शुरूआत करने का अर्थ यह है कि यदि प्रत्येक परिवार इस बात की जिम्मेदारी उठा ले कि वह कचरे के निस्तारण के वैज्ञानिक तरीके अपनाकर इस मुहिम में सहभागी बनने को तैयार है तब ही इस काम में सफल हुआ जा सकता है। घरों से निकला कचरा ज्यादातर लैण्डफिल साईटों तक पहुंचता है जिसका प्रबंधन करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है और केन्द्र सरकार का सहयोग अनिवार्य है।
चार कड़ियां
इस प्रकार व्यक्ति, समाज, राज्य और केन्द्र की सरकार इन चारों कड़ियों को जोड़कर कूडे़ के ढेर से पैदा होने वाली आपदाओं से न केवल सुरक्षित बचा जा सकता है बल्कि यह चारों कड़ियां भी मजबूत होती हैं क्योंकि एक ओर कूड़े से बरकत का रास्ता मिलता है तो दूसरी ओर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से बचा जा सकता है।
इसीलिए कहते हैं कि कूड़े के ढेर में जो खजाना छिपा है उसे पहचानकर मालामाल होने में भलाई है न कि इस ढेर से अपने और अपनी संतान के लिए प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग की सौगात देनी है।
कुछेक उदाहरणों से बात स्पष्ट हो जाएगी क्योंकि यह केवल कपोल कल्पना या बुद्धि विलास नहीं है, बल्कि हकीकत है।
स्वच्छता की पोल
आजकल सामान्य व्यक्ति से लेकर प्रधानमंत्री तक स्वच्छता की बात करते हैं लेकिन इसमें उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिल रही है। कारण वही है कि जब तक स्वच्छता अभियान में विज्ञान और टेक्नालाॅजी को शामिल नहीं किया जाएगा तब तक किसी भी तरह से प्रगति की वास्तविक ऊंचाईयों तक नहीं पहुंचा जा सकता। अब इसके लिए चाहे कितनी भी आंकड़ों की बाजीगरी दिखा लें कि हमने इतने लाख, करोड़ शौचालय बनवा दिये लेकिन आज भी विशेषकर गांव देहात, झुग्गी झोपड़ी स्लम में रहने वाले खुले में शौच को प्राथमिकता देते हैं।
इसकी दो वजह हैं; एक तो यह कि जिस तरह से शौचालय निर्माण हुआ है उससे पहले  सीवेज डिस्पोजल का इंतजाम होना चाहिए था। अगर उसे करने के इंतजाम नहीं थे तो भी कोई बात नहीं, सरकारें ऐसी तकनीकों से युक्त शौचालय बनवा सकती थी जिसमें सीवेज की जरूरत न हो। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, जबकि बिना सीवेज के भी शौचालय की गन्दगी से निपटा जा सकता है। इसके लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है, हमारे ही देश में शौचालय निर्माण की ऐसी टेक्नालोजी और तकनीक मौजूद है जिसे अपनाकर इस समस्या से निपटा जा सकता है। इसका भी उदाहरण पेश हैः पिछले दिनों रूड़की में सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा विकसित दो गडढ़ों वाले शौचालय बनाने की टेक्नालाॅजी समझने का अवसर मिला तो यह कहावत ध्यान में आई कि बगल में छोरा और शहर में ढ़िढोरा।
इसे विस्तार से बताते हैं। इसमें यह करना होता है कि चार गुणा चार की लम्बाई चैड़ाई और 7-8 फीट की गहराई वाले दो गड्ढ़े बनाए जाते हैं। उसके बाद विशेष प्रकार की ढलान वाली सीट युक्त शौचालय बनाकर इन गड़ढ़ों से जोड़ दिया जाता है। मलमूत्र सीधा पहले गड्ढ़े में गिरता रहता है। 5-6 सदस्यों वाले परिवार द्वारा प्रतिदिन उपयोग करने पर यह गड्डा 3-4 साल में भर जाता है और तब दूसरे गड्ढ़े में मलमूत्र भरना शुरू हो जाता हैं। पहले गड्ढ़े की गंदगी कुछ समय में आर्गेनिक खाद के रूप में बदल जाती है जो खेतीबाड़ी के काम आती है। इस तरह न तो गंदगी फैलती है, न बदबू आती है और न ही बीमारियों के फैलने का खतरा। लागत भी कोई बहुत नहीं, 20-25 हजार मंे बरसों काम आने वाला शौचालय तैयार है। यह उन सभी जगहों में लगाया जा सकता है जहां सीवेज व्यवस्था नहीं है, वेस्ट डिस्पोजल के पर्याप्त प्रबंध नहीं हैं। इस तरह के शौचालय में विशेष सीट लगने के कारण पानी की जरूरत भी कम रहती है। यहां भी वही नियम लागू होता है कि हमने जो प्रकृति से लिया वह दूसरे रूप में लौटा दिया। अर्थात् खेतों की उपज भोजन के रूप में हमारे शरीर में गई और मलमूत्र के रूप में जैविक खाद बनकर फिर से खेतों में उपज तैयार करने के काम में आने लगी।
इसी तरह की छोटी छोटी लेकिन बड़े फायदे की टेक्नालाॅजी हमारे अपने देश के ही वैज्ञानिक संस्थानों ने तैयार की हुई हैं।
औद्योगिक कचरा
इसी तरह औद्योगिक कचरे को भी नियत्रित किया जा सकता है, नदी नालों और नहरों में खतरनाक केमीकल से होने वाले जल प्रदूषण से केवल उन उद्योगों में वाटर ट्रीटमेंट प्लाण्ट लगाकर बचा जा सकता है। दिक्कत यह है कि सामान्य व्यक्ति हो या सरकार, केवल तब ही एक्शन में आते हैं जब कोई भी मुसीबत बिल्कुल हमारे सिर पर आ जाती है।
लेकिन कुदरत तो किसी को बख्शती नहीं। उसके लिए हमारी लापरवाही और गलतियों की सजा तो मिलनी ही है। मजे की बात यह है कि इसके लिए हम कुदरत पर दोष डालकर इन दुर्घटनाओं को दैविक आपदा का नाम दे देते हैं, जबकि गलती हमारी होती है। आखिर कब तक हमारी सरकारें देशवासियों की जरूरतों के साथ खिलवाड़ करती रहेगीं, जरा सोचिए।

(भारत)